स्वास्थ्य क्या होता है ? स्वास्थ्य के प्रकार, लक्षण एंवम उपाय

स्वास्थ्य क्या होता है ?


स्वास्थ्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, स्व + स्थ। स्व का अर्थ है – आत्मा या अपना एंवम स्वयं, तथा स्थ अर्थात स्थित होना। अत: स्वयं में स्थित होना ही स्वास्थ्य कहलाता है।
स्व में शरीर, मन, तथा आत्मा आते है। इन सभी का अपनी जगह में स्थित होना ही स्वास्थ्य है। स्वस्थ का अर्थ है – निरोग। जब हम निरोग रहे तथा किसी प्रकार का रोग ना हो तभी हम स्वस्थ कहलाते है।

स्वास्थ्य का सीधा संबध हमारे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एंवम सामाजिक स्वास्थ्य से है।
अर्थात वही मनुष्य स्वस्थ है, जिसके शरीर में शारीरिक रूप से कोई रोग ना हो, कोई मानसिक विकार ना हो। वह समाज का अभिन्न अंग हो एंवम चरित्र उत्तम हो, और आध्यात्मिक रूप से वह स्वस्थ हो, अर्थात् वह ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास रखता हो।
स्वास्थ्य के प्रकारों का वर्णन

  1. शारीरिक स्वास्थ्य – स्वस्थ व्यक्ति वह है, जिसके शरीर कि सबसे छोटी से छोटी कोशिका से लेकर उसका एक – एक अंग सुचारु रूप से कार्य कर रहा हो। एंवम विभिन्न तंन्त्रों के बीच उसका समायोजन हो तथा संपूर्ण शरीर का अच्छे से तालमेल हो और सभी कार्य सुचारु रूप से हों। एंवम शारीरिक रूप से स्वस्थ वह व्यक्ति कहलाता है जिसके शरीर में किसी भी प्रकार का रोग और कोई विकार ना हो।
  2. मानसिक स्वास्थ्य – मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए मनोवैज्ञानिक पी0 बी0 ल्यूकन ने लिखा है – मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह है जो स्वयं सुखी है। अपने आस – पास के लोगों के साथ शान्तिपूर्वक रहता है। अपने बच्चों को स्वस्थ नागरिक बनाता है, और इन आधारभूत कर्तव्यों को करने के बाद भी जिसमें इतनी शक्ति बच जाती है कि वह समाज एंवम अपने देश के हित में कुछ कर सके।
  3. सामाजिक स्वास्थ्य – सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह है, जो समाज के साथ जुड़ा रहे। व्यवहारिक हो। तथा बड़ों का सम्मान करता हो, सभी के साथ आत्मीयता रखता हो। विपदा में पड़े लोगों की रक्षा करता हो। तथा वह किसी की भी आत्मा को ठेस नहीं पहुँचाता हो। एंवम समाज एंवम राष्ट्र के नियमों के अनुसार चलता हो।
  4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य – आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य, ईर्ष्या, भय, प्रमाद, चिंता आदि से दूर रहता हो, व स्वयं के सभी कर्मो को प्रभु को अर्पित कर देने वाला हो, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हो।
    इस प्रकार संपूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना तभी कि जा सकती है जब शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य आदि का समायोजन हो।
    स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण
    स्वस्थ व्यक्ति लक्षण निम्नलिखित रूप से हैं –
  5. जिस व्यक्ति को भूख खुलकर लगती हो।
  6. जिसका भोजन समय पर पच जाता हो।
  7. मलों का निष्कासन सही समय पर एंवम निश्चित मात्रा होता हो।
  8. शरीर में भारीपन (आलस्य आदि) का ना होना
  9. अग्नियों का सम होना – आयुर्वेद के अनुसार शरीर में 13 प्रकार की अग्नियाँ है। पाँच पंचमहाभूतों की अग्नि, सात, सप्त धातुओं की धात्वग्नि और एक पाचकाग्नि या जठराग्नि इन सभी अग्नियों का सम होना ही पूर्ण स्वास्थ्य है।
  10. जिसका मन तथा इन्द्रिया प्रसन्न हों।
    स्वस्थ रहने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को बल, वर्ण तथा आरोग्यता कि प्राप्ति होती है। जिसका विस्तृत वर्णन इस प्रकार से है
    सुप्रसन्द्रियत्वं – मन तथा इन्द्रियों का प्रसन्न होंना – ये पंक्तियाँ हमारे मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को परिभाषित करती है। जब मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहता है, तो हमारा मस्तिष्क भी स्वतः ही स्वस्थ रहता है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है।
    शरीर के स्वस्थ होने पर ही इन्द्रियाँ एंवम मन स्वतः ही नियंत्रित हो जाते है। यही स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण है। स्वस्थ रहने के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में बल वर्ण की प्राप्ति होती है। आरोग्य और आयुष्य की प्राप्ति होती है।

स्वास्थ्य (आरोग्य) को प्राप्त एंवम हमेशा बनाए रखने के नियम
स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए पालनीय नियमों का वृत्त, इसे ही स्वस्थवृत्त कहते हैं। स्वस्थवृत्त का वर्णन आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलता है।
आयुर्वेद का प्रमुख लक्ष्य है- रोगों से पीड़ित मनुष्यों को रोग से मुक्त करना तथा स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
आयुर्वेद के अनुसार दो प्रयोजन हैं-

  1. स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य कि रक्षा करना।
  2. रोग से पीड़ित मनुष्य के रोगों का शमन करना ।
    उपाय एंवम रक्षा
    स्वस्थ व्यक्ति किस प्रकार दिनचर्या, का पालन कर स्वास्थ्य का रक्षण कर सकता है –
    स्वस्थ मनुष्यों के लिए आयुर्वेद शास्त्र में दिनचर्या, निशाचर्या और ऋतुचर्या का वर्णन किया गया है तथा उन्ही के अनुसार आहार – विहार का विधान बताया गया है। तथा जो मनुष्य इसके अनुसार आचरण करता है। वह निश्चय ही स्वस्थ रहता है। अन्य कोई नहीं। और वह मनुष्य अपनी दीर्घायु का उपभोग करता है।
    स्वस्थवृत्त के अन्तर्गत देश, काल, ऋतु और प्रकृति के अनुरूप आहार – विहार का वर्णन किया गया है। क्योंकि देश काल ऋतु और अपनी प्रकृति के अनुसार आहार – विहार करने से तीनों दोष (वात, पित्त, कफ) प्राकृत अवस्था (सम) बने रहते है।
    अग्नि भी सम बनी रहती है। तथा मल (स्वेद-मूत्र-पूरीष) की क्रिया भी सम रहती है। अर्थात् मलादि का निष्कासन उचित समय तथा उचित मात्रा में होता है, तथा इन्द्रियाँ मन और आत्मा प्रसन्न रहते है।
    इस प्रकार शरीर में किसी भी प्रकार की विषम स्थिति नहीं होती है तथा मनुष्य के शरीर की सभी क्रियाएं प्राकृतिक रूप में होती रहती है। तथा शरीर में विकार उत्पन्न नहीं होते। मनुष्य सदैव स्वस्थ ही रहता है।
    इस प्रकार स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा देश, काल, ऋतु प्रकृति के अनुसार उसके सम्यक आहार – विहार का उपदेश करना स्वस्थवृत्त का प्रयोजन है।

नोट – संसार में सब कुछ छोड़कर स्वयं के शरीर का पालन करना चाहिए। क्योंकि शरीर ही सभी सुख – दुःख के भोग का माध्यम है।

चरक संहिता में महर्षि जी ने कहा है कि –
” नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी। स्वषरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत्।।“

अर्थात् जिस प्रकार नगर स्वामी नगर तथा सारथी रथ की रक्षा में सदा तत्पर रहता है, उसी प्रकार बुद्धिमान पुरूष को अपने शरीर की रक्षा में सदा तत्पर रहना चाहिए।

आयुर्वेद में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दिनचर्या का वर्णन इस प्रकार है –

  1. दिनचर्या – प्रातःकाल ब्रह्ममुर्हत में उठने से लेकर सायं काल तक किये
    जाने वाले सभी कर्म जिससे हमारा स्वास्थ्य उच्च अवस्था में बना रहता
    है। हमारे शरीर को बल व लंबी आयु की प्राप्ति होती है।
    दिनचर्या के अन्तर्गत निम्नलिखित कर्म आते है-

आत्मबोध की साधना – ब्रह्ममुहुर्त में उठ कर यह साधना की जाती है। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण तथा कृतज्ञता का भाव तथा पूरे दिन के लिए मार्गदर्शन की कामना इस साधना में की जाती है।
भूनमन या भूमि को नमस्कार – धरती माता को स्पर्श करने के लिए क्षमा याचना एंवम साथ ही पृथ्वी तत्व से ऊर्जा लेने कि विधी इसी के अंतर्गत आती है।
ऊषापान – प्रातः शौच जाने से पूर्व ऊषापान का विधान है। ऊषापान में शीतल जल ही पीना चाहिए। जिससे हमारा पाचन तंत्र मजबूत होता है।
शौच – ऊषापान के पश्चात शौच का क्रम आता है। सूर्योदय से पूर्व ही शौच जाना चाहिए।
दांतों कि सफाई – प्राचीन काल में दन्तधावन के लिए नीम व बबूल आदि की दातुन का प्रयोग किया जाता था, लेकिन आजकल ब्रश का इस्तेमाल होने लगा है। फिर भी हमे दांतों कि सफाई के लिए आयुर्वेदिक मंजन एंवम प्राकृतिक दातुन का ही प्रयोग करना चाहिए।
जीभ कि सफाई – दांतों को साफ करने के उपरांत जीभ कि सफाई का नंबर आता है। इससे हमारी जीभ की अच्छी तरह सफाई हो जाती है।
गरारा – इनके के बाद शीतल जल से गरारा करने का विधान आयुर्वेद शास्त्रों में बताया गया है।
मुख प्रक्षालन – गरारों के पश्चात मुख एवं नेत्र प्रक्षालन करना चाहिए।
अंजन का प्रयोग – मुख प्रक्षालन के बाद आँखों में अंजन लगाना चाहिए। अंजन के प्रयोग से हमारी आँखों कि रोशनी हमेशा बनी रहती है।
नस्य – आयुर्वेदाचार्यों ने प्रतिदिन नासाछिद्रों में स्नेह लगाने का निर्देश दिया है, क्योंकि प्रतिदिन नस्य करने से मनोरोग एंवम गर्दन से ऊपर के रोग नहीं होते है।
धूमपान – औषधीय द्रव्यों को लेकर धूमपान करने का निर्देश आचार्यों ने दिया है। जिससे मस्तिष्क व गले के रोगों का नाश होता है।
व्यायाम एवं योग – इसके पश्चात व्यायाम का क्रम आता है। जो व्यक्ति व्यायाम एंवम योग करने में समर्थ हो उन्हें सामर्थ्य के अनुसार व्यायाम व योग करना चाहिए तथा जो समर्थ ना हो उन्हें घूमना – फिरना (चहलकदमी) करनी चाहिए।
शरीर कि मालिश – आयुर्वेद में अपने शरीर कि मालिश करने को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मालिश विशेष रूप से वातहर तथा वेदनाहर है। मालिश, स्वास्थ्य तथा आयु को बढ़ाने वाली, त्वचा को सुन्दर बनाने वाली है।
• स्नान – प्रतिदिन स्नान रोगों का नाश करता है। यह निद्राहर है, तथा पसीने, खुजली का नाश करता है। ऋतुओं के अनुकूल जल से स्नान करना चाहिए ।
वस्त्र धारण – सदा निर्मल एंवम साफ स्वच्छ वस्त्र ही धारण करने चाहिए। निर्मल वस्त्र, सुख एंवम अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने वाले तथा उत्साह वर्धक होते हैं।
ध्यान – प्रतिदिन की दिनचर्या में ध्यान का विशेष महत्व है। इससे सद्प्रवृत्ति, बुद्धि, यश, कीर्ति तथा आत्मिक रूप से ऊर्जा प्राप्त होती है।
स्वाध्याय – स्वाध्याय द्वारा सद्ग्रन्थों का अध्ययन मनन करना तथा उन्हें अपने जीवन में उतारकर स्वयं का जीवन उत्कृष्ट बनाना यह स्वाध्याय है। यह दिनचर्या का प्रमुख अंग है।
भोजन – आयुर्वेद के ग्रन्थों में आहार को अमृत के समान बताया गया है तथा इसका सेवन बिल्कुल सही विधि पूर्वक करने का निर्देश दिया गया है। सुश्रुत संहिता में आहार को शरीर को पुष्ट करने वाला, बलकारक, शरीर का विकाश करने वाला, आयु, तेज, उत्साह स्मृति देने वाला तथा अग्नि को बढ़ाने वाला कहा गया है।

दिनचर्या के अन्त में जो पूरे दिन कर्म किये हैं उनका मन मे ही विश्लेषण किया जाता है इस क्रिया को तत्वबोध की साधना के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार दिन मे जो भी कर्म किये उन सभी को प्रभु को सौंप कर स्वयं भी उसी की गोद में सो जाना को देखकर उनके अनुकूल आहार – विहार का सेवन करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रहता होती है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *