जानिए प्रकृति के महान चिकित्सकों के बारे में

प्रकृति रूपी चिकित्सक आपको सुन्दर स्वास्थ्य प्रदान करने के लिये तत्पर है। हमारे स्वास्थ्य-निर्माण के क्षेत्र में वह विशेषज्ञ है और शत प्रतिशत वह सफल भी होती है।मनुष्य भले ही उससे विमुख हो, पर वह उस पर दया की ही वर्षा करती है। 

वह विश्व के चिकित्सकों में सबसे अधिक दयावान है 

और बाल, वृद्ध, युवा, शिक्षित, अशिक्षित एवं धनी-गरीब सबकी समान रूप से सेवा करती है।वह न तो ऑपरेशन करती है और न औषधि ही देती है और हम सभी उससे परिचित हैं और समय-समय पर उसकी सहायता भी लेते हैं वह हमारी केवल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि मित्र बनकर हमको सदा 

जवानी प्रदान करना चाहती है अतःआप भी उसके साथहाथ बढ़ाकर मित्रता कीजिये। 

सबसे पहले आप जीवनदाता चिकित्सक सूर्य से मिलिये। 

प्रथम चिकित्सक 

सूर्य 

सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं विशाल से विशाल जीव इससे शक्ति प्राप्त करता है। 

समस्त प्राणियों के लिये सूर्य-शक्ति अनिवार्य है। सूर्य-रश्मियों से हमारी त्वचा सशक्त एवं कांतिमय होती है और पीलापन समाप्त होकर स्वाभाविक रंग निखरता है। 

सूर्य रश्मियों की छत्रछाया एवं प्रकाश में ही प्राणी

प्रसन्नता, स्वास्थ्य एवं यौवन प्राप्त कर सकता है, अन्धकार में नहीं। 

आज सूर्य विमुख महिलायें अपने पीले, मुरझाये चेहरे

को कृत्रिम प्रसाधनों द्वारा छिपाती है। 

सूर्यरश्मियों के अभाव में व्यक्ति कमजोर, 

रोगी एवं पीला नजर आता है। सूर्य-रश्मियां सर्वश्रेष्ठ कीटाणुनाशक हैं।स्नायविक दौर्बल्य दूर करती हैं। 

जब आप धूप लेते हैं तो लाखों सूक्ष्म स्नायुयों को सूर्य-शक्ति प्राप्त होती है।इस प्रयोग के लिये आप दृढ़ संकल्पी बनिये। 

एक बढ़िया मैदान, जहां घास हरी कारपेट की तरह बिछी हो, किसी झरने या नदी के किनारे, वृक्ष के नीचे जहां सूर्य रश्मियां आ रही हो, 

में रोजाना प्रातः काल नंगे बदन, 

यदि गरमी है तो सिर पर तौलिया रखकर, प्रथम रीढ़ फिर अन्य हिस्सों पर 15 मिनट से प्रारम्भ कर क्रमशः बढ़ाते हुये 1 घंटा तक धूप ली जा सकती है और धूप से पके खाद्य को आहार में अधिक से अधिक स्थान दिया जाये। 

ताजा फल सब्जी खाने पर उसका रस हम अपने अन्दरजज्ब करते हैं।हरीतिमा सूर्य शक्ति है जिसे पौधे सूर्य से अपने में जज्ब करते हैं।अतः आप जितनी सहन कर सकें, उतनी धूप अवश्य लें। 

द्वितीय चिकित्सक 

शुद्ध वायु 

शुद्ध वायु भी विशेष चिकित्सक है, ईश्वर प्रदत्त शुद्ध ताजी वायु में सांस लीजिये।जन्म एवं मृत्यु के बीच का जीवन सांस पर ही निर्भर है।

सदा गहरी सांस लेना चाहिये और इस प्रकार आप ईश्वरकी जीवन प्रदाता ऑक्सीजन धारण करेगें।जो चिकित्सक की बात न मानकर शुद्ध वायु नहीं लेते, वे गंभीर रोगों के चंगुल में फंसते हैं। 

सांस की क्रिया का हमें अन्वेषण करना चाहिये।यह अदृश्य है, यह हमारी ऐसी खुराक है कि यदि 5-7 मिनट तक भी न मिले तो मौत निश्चित है।

सांस द्वारा हम केवल ऑक्सीजन ही नहीं धारण करते बल्कि फुफ्फुस के माध्यम से संस्थान के प्रत्येक कोष में पहुंचने से बहुत सारी गन्दगी तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैस, जो अधिकतर रोग का कारण है, निकलती है। 

जो गहरी सांस के अभ्यासी नहीं हैं उनके अंदर, रोग काकारण कार्बन-डाइऑक्साइड एवं नाइट्रोजन आदि संचित होता है।फलस्वरूप कमजोरी आती है एवं ताजगी, स्फूर्ति विदा हो जाती है। 

आपको केवल सांस नहीं बल्कि शुद्ध हवा-युक्त स्थानों पर गहरी सांस लेने का सदा ध्यान रखना चाहिये। 

हमारे अंदर वायुयन्त्र हैं

ऑक्सीजन केवल हमारे शरीर की शुद्धि ही नहीं करता बल्कि आप जितनी ही गहरी सांसें लेंगे, आपकी आयु उतनी ही बढ़ेगी।

भारतीय लोगों के जीवन में प्राण याम के माध्यम से गहरी सांस लेने की अनेक विधियां हैं।इसी के बल पर हमारे ऋषि-मुनि स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होते थे। 

श्रमहीन बैठकर काम करने वालों को तो निश्चय ही नित्यनियमित गहरी सांस लेनी चाहिये गहरी सांस – जीवन का स्रोत आप जब भारतीय ऋषि- मुनियों या योगियों के जीवन पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि उनकी अपार कार्य क्षमता एवम् स्वस्थ-जीवन का एकमात्र कारण गहरी सांस ही है। 

इसके बल पर ही उन्होंने दुर्लभ ग्रंथों का सृजन किया है।हमें गहरी सांस के लिये कुछ देर अवश्य ही खुली वायु में रहना चाहिये ताकि हमारी त्वचा आवश्यक ऑक्सीजन ले सके।रोजाना कम से कम 1 मील दौड़कर 3-4 मील तेजी से टहलना चाहिये। 

तेजी से चलने पर संचित कार्बनडाइऑक्साइड तेजी से साफ होती है।जब आप उपवासया रसाहार करें तो निश्चित ही गहरी सांस का अभ्यास करना चाहिये ताकि अधिक के अधिक ऑक्सीजन प्राप्त करके हम अधिक से अधिक विकार को जला सके एवं कार्बनडाइऑक्साइड बाहर निकाल सकें। 

आप पुनः स्मरण कर लें कि यदि आपको सुखी एवं दीर्घजीवन जीना हो तो शक्ति के अनुसार रोजाना तेजी से घूमना, तैरना एवं दौड़ना चाहिये ताकि फेफड़े स्वतः गहरी सांस ले सकें। 

तृतीय चिकित्सक 

शुद्ध जल 

शुद्ध जल सूक्ष्म चिकित्सक एवं शानदार मित्र है।हमारे शरीर का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल है।यह पसीना, पेशाब एवं अन्य मार्गों से निरंतर निकलता रहता है अतः इसकी पूर्ति अवश्य करना चाहिये। 

यदि हम फल-सब्जी अधिक मात्रा में खाते हैं या उसका रस पीते हैं तोउच्च कोटि का विटामिन एवं सजीव प्राकृतिक लवण-युक्त जल हमें प्राप्त होता है।

सूखे घर्षण के बाद ठण्डे जल से स्नान करने पर रक्त संचार तीव्र होकर लाल 

रक्त-कणों मे वृद्धि होती है, चैतन्यता एवम् भूख जाग्रत होती है।जाड़ों के दिनों में सप्ताह में एक दिन शरीर के ताप जितना गरम स्नान करके अंत में ठण्डा स्नान करना चाहिये।घर्षण से शिथिलीकरण होता है और कार्य क्षमता उन्नत होती है। 

जल में तैरना व्यक्तियों के लिये बहुत ही उत्तम व्यायाम है। जल को प्रारम्भ से ही औषधि रूप में प्रयोग किया जाता रहा है।वेद में कहा भी गया है कि “मनुष्यों, तुम्हारे लिये औषधिजल में प्रदान की है। गंगाजल ईश्वर प्रदत्त औषधी ही है।प्राकृतिक चिकित्सा का आधार भी जल-चिकित्सा है। 

भारत में तमाम ऐसे गरम- ठण्डे झरने हैं जो औषधि के रूप में प्रयोग होते हैं बिहार में राजगीर का गरम झरना रेडियम गुण के लिये प्रसिद्धहै। जल का बाहरी एवं भीतरी प्रयोग हमें सुन्दर स्वास्थ्य प्रदान करता है आहार में प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट की 50 प्रतिशत मात्रा घटा देने पर भी कोई हानि नहीं होगी, किन्तु जल घटा देने पर रक्त का संतुलन बिगड़कर रक्त संचार मंद होगा एवं रक्त गाढ़ा होने से हृदय गति रुकना एवं रक्त चाप आदि भयंकर रोग हो सकते हैं। 

ऑक्सीजन के बाद शुद्ध जल ही जीवन के लिये महत्वपूर्ण तत्व है।

बिना भोजन के महीनों जीवित रहा जा सकता है पर बिना जल के 8-10 दिन भी बिताना कठिन है।शरीर जल का उपयोग कैसे करता है।जीवन तथा प्राण-से सम्बंधित प्रत्येक तरल पदार्थ का आधार ही जल है। 

प्राण रस (प्रोटोप्लाज्म) का अस्तित्व बिना जल के नहीं रह सकता। कोई भी जल के बिना जीवित नहीं रह सकता। पाचन-प्रणाली में जज्ब हुई भोजन-सामग्री के चयापचय का माध्यम भी जल ही है।जल के माध्यम से आहार का रासायनिक परिवर्तन होता है।जल शरीर ताप को नियंत्रित रखता है।यह यांत्रिक लुब्रीकेशन का भी काम करता है। 

जल और पाचन बिना जल के पाचन नहीं हो सकता।रासायनिक क्रिया द्वारा जल का विश्लेषण होता है।यह प्रोटीन, स्टार्च एवं चिकनाई को खाद्य-रस में बदलता है तथा विभिन्न कोषों के काम आता है। 

आमाशयिक ग्रंथि को उद्दीप्त करके, ठोस को द्रव्य बनाकर जज्ब करने एवं व्यर्थ पदार्थ को बाहर निकालने काकाम करता है।जल तरल खाद्य है।

किण्व, यकृत एवं क्लोम 90 प्रतिशत जल के सहारे ही खाद्य-पाचन को आत्मसात करते हैं। 

स्वयं जज्ब होने के बाद जल का प्रथम काम है – नये पचे हुये खाद्य को रक्त संचार द्वारा कोषों तक पहुंचाना।जल के सहारे ही गुर्दा, त्वचा एवं फुफ्फुस शरीर के अंदर की गंदगी निकालते हैं। 

रक्त एवं जल – पानी की अपेक्षा रक्त गाढ़ा होता है। इसमें 10 प्रतिशत प्राण रस एवं 90 प्रतिशत पानी होता है। यह शरीर संस्थान के लिये आवश्यक सभी तत्वों को ले जाता है। 

जल हमें ठंडा रखता है स्वचालित यंत्र के रेडियेटर में जल होता है ताकि इंजन ठण्डा रह सके।

यही युक्ति मानव-शरीर के लिये भी लागू होती है।पसीना निकलने से ठण्डक की अनुभूति होती है।जल स्नेहकर है – जल की उचित मात्रा पीने तथा स्ना

आदि से सब अवयवों में अपने आप स्नेहल एवं चिकनाईमिल जाती है। 

इससे शरीर लोचदार एवं गतिशील होता है। पेशियों की शक्ति बिना जल के नहीं टिक सकती। 

जल के तीन साधन हैं – 

1. प्रथम तो जल ही है जिसमें जल, फल एवम् सब्जी का रस है। 

2. भोजन एवं भोजन पचाने जब के दौरान उत्पन्न रस एवं 

3. चयापचय के माध्यम से भी जल प्राप्त होता है। 

शरीर की प्यास 

शरीर में पर्याप्त जल नहीं होता तो प्रतिक्रिया स्वरूप ग्रंथियों का स्राव रुक जाता है।जिससे उनकी झिल्लियां सूखने लगती हैं तब हमें प्यास लगती है और जब जल समय पर नहीं मिलता तो सिर-दर्द, स्नायविक चंचलता, पाचन की खराबी एवं भूख का अभाव आदि की अनुभूति होती है। 

अतः जब भी प्यास लगे, पानी अवश्य पीना चाहिये। 

चौथा चिकित्सक 

हमारी धरती 

धरती हमारी महान चिकित्सक ही नहीं वरन् जननी भी है, जो हमारे विकार को लेकर बदले में केवल बढ़िया फल, सब्जी एवं अन्न आदि देती है। 

धरती हमारे अंदर के सारे विकारों को भी अपने अंदर खींचकर स्वस्थ नव स्फुरण प्रदानकर चेतना जाग्रत करती है।

अतः हमें धरती के संपर्क में अवश्य ही रहना चाहिये।रोजाना कम से कम 30-60 मिनट तक नंगे पैर अच्छी मिट्टी या घास पर टहलनाचाहिये।

आप देखेंगे कि टहलने से आपकी स्नायविक शक्ति कितनी उन्नत, नेत्र कितने तेजस्वी एवम् बुद्धि कितनी कुशाग्र एवं निर्णायक हो रही है और आपके शरीर के दूषित तत्व धरती अपने अंदर जज्बकर आपको शुद्ध स्वस्थ स्फुरण प्रदान कर जीवनी शक्ति से भर देती है। 

इसलिये धरती पर सोना पलंग पर सोने की अपेक्षा श्रेष्ठ माना जाता है। 

ध्यान के लिये भी धरती पर आसन बिछाकर बैठना उत्तम है।यही कारण है कि प्रात: उठते ही धरती को स्पर्श कर प्रणाम करने का नियम है।

यदि हम धरती से नाता जोड़ेगे तो हमें शुद्ध प्राकृतिक आहार, शुद्ध विचार और कार्य प्राप्त होगा और इस प्रकार शुद्ध अहिंसक स्वस्थ मानव-समाज की स्थापना हो सकेगी। 

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